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मिथिला की राजसी परंपरा की शांत विदाई: दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का निधन

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दरभंगा।मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और दरभंगा राजघराने की गौरवशाली विरासत की साक्षी रहीं महारानी कामसुंदरी देवी अब हमारे बीच नहीं रहीं। सोमवार को 94 वर्ष की आयु में उन्होंने दरभंगा स्थित अपने आवास कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही दरभंगा राज की वह अंतिम कड़ी भी समाप्त हो गई, जिसने रियासती दौर से लेकर आधुनिक भारत तक का लंबा सफर अपनी आंखों से देखा।
महारानी कामसुंदरी देवी, दरभंगा रियासत के अंतिम महाराज सर कामेश्वर सिंह की अंतिम जीवित पत्नी थीं। उनका जीवन राजसी वैभव के साथ-साथ संघर्ष, परिवर्तन और सांस्कृतिक संरक्षण की मिसाल रहा। उनके जाने से मिथिलांचल में शोक की लहर है और राजघराने से जुड़ी स्मृतियां मानो इतिहास के पन्नों में सिमटती चली गई हैं।
लंबे समय से अस्वस्थ थीं महारानी
पिछले कुछ वर्षों से महारानी का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था। सितंबर 2025 में एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे के दौरान बाथरूम में गिरने से उन्हें गंभीर चोट लगी थी, जिसके बाद ब्रेन हेमरेज की स्थिति उत्पन्न हो गई। मस्तिष्क में रक्त के थक्के जमने के कारण उन्हें लंबे समय तक गहन चिकित्सा कक्ष में रखा गया। तमाम चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद उनकी सेहत में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका।
राजघराने की परंपराओं की संवाहक
1940 के दशक में महारानी कामसुंदरी देवी का विवाह महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह से हुआ था। महाराजा के निधन के बाद उन्होंने न केवल पारिवारिक दायित्वों को संभाला, बल्कि दरभंगा राज से जुड़ी परंपराओं, ट्रस्टों और कानूनी मामलों को भी दृढ़ता से आगे बढ़ाया। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने गरिमा और संयम के साथ राजघराने का प्रतिनिधित्व किया।
संस्कृति और शिक्षा के लिए समर्पित जीवन
महारानी ने अपने पति की स्मृति में कल्याणी फाउंडेशन के माध्यम से मिथिला की कला, साहित्य और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का कार्य किया। दरभंगा राज की ऐतिहासिक निजी लाइब्रेरी को आम लोगों के लिए खोलना उनका एक बड़ा योगदान माना जाता है, जहां हजारों दुर्लभ ग्रंथ और पांडुलिपियां आज भी सुरक्षित हैं।
अंतिम वर्षों तक सक्रिय रहीं
जीवन के अंतिम चरण में भी महारानी दरभंगा ट्रस्ट और संपत्ति से जुड़े कानूनी मामलों को लेकर सजग रहीं। हाल ही में दशकों पुराने उत्तराधिकार विवाद के सुलझने के बाद राजपरिवार में नई पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपी गई। इन तमाम उतार-चढ़ावों के बीच महारानी ने सादगी और मर्यादा को कभी नहीं छोड़ा।
राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
महारानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार दरभंगा राज परिसर स्थित श्यामा माई मंदिर प्रांगण में पारंपरिक विधि-विधान और सम्मान के साथ किया जाएगा। उनके पौत्र द्वारा उन्हें मुखाग्नि दी जाएगी। अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग कल्याणी निवास पहुंचकर मिथिला की इस राजमाता को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।
महारानी का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि मिथिला के इतिहास, संस्कृति और राजसी परंपरा के एक युग का अवसान है।

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